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Vihar Seva Group

About the Vihar Seva Group

1. प्रवेश: पैरों के छाले और पहियों की अंधी दौड़

सुबह के ठीक पाँच बजे हैं। नेशनल हाईवे पर घना कोहरा तैर रहा है। एक तरफ सौ किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ते भारी ट्रक और बेकाबू ट्रेलर, जिनकी तेज हेडलाइट्स कोहरे को चीर रही हैं। और दूसरी तरफ, उसी हाईवे के कच्चे किनारे पर श्वेत वस्त्र पहने, नंगे पांव, मौन साधना में आगे बढ़ते जैन साधु-भगवंत।

जैन परम्परा में यह दृश्य कोई नया नहीं है। भगवान महावीर के काल से, यानी पिछले 2500 वर्षों से जैन श्रमण-श्रमणी चातुर्मास के चार महीने छोड़कर साल के आठ महीने लगातार पदविहार करते हैं। न कोई गाड़ी, न कोई सुविधा।

एक जमाना था जब छोटे-छोटे गांवों में श्रावकों के सैकड़ों घर हुआ करते थे। गुरु भगवंत गांव की धूल भरी पगडंडियों से गुजरते, रास्ते सीधे थे, ट्रैफिक का नामोनिशान नहीं था। हर गांव में गोचरी (आहार-पानी) सुलभ थी। जब गुरु पधारते, तो पूरा गांव पलक-पांवड़े बिछाकर सामने लेने आता; जब विहार करते, तो पूरा संघ भावविह्वल होकर विदा करने जाता।

फिर वक्त ने करवट ली। रोजगार और व्यावहारिक कारणों से श्रावक गांवों की चौखट छोड़कर बड़े-बड़े महानगरों में जा बसे। गांवों में जैन घर उंगलियों पर गिनने लायक रह गए। नतीजा यह हुआ कि गांवों के रास्ते बंद हो गए क्योंकि वहां न गोचरी मिलती थी, न ठहरने की जगह। विवश होकर, संतों को शहरों तक पहुंचने के लिए नेशनल हाईवे के जानलेवा डामर पर कदम रखना पड़ा।

2. हादसों का खूनी दौर और एक संत का सुलगता हृदय

हाईवे चौड़े होते गए और उन पर दौड़ने वाले वाहनों की रफ्तार बेकाबू होती गई। हाईवे पर न तो जैनों के घर थे, न कोई सुरक्षा। सुबह-सुबह जब अंधेरा छंटने को होता, तभी किसी थके हुए या लापरवाह ड्राइवर की एक हल्की सी झपकी आती, गाड़ी का पहिया मुड़ता और सड़क पर शांति से चल रहे संतों को कुचल देता।

शुरुआत में साल में एकाध दुर्घटना होती थी। लेकिन धीरे-धीरे यह आंकड़ा 5, 10, 15 और 20 तक पहुंच गया!

सोचिए, एक साधु को तैयार करने में, उसे आगमों का ज्ञान देने में, कठोर संयम सिखाने में गुरु कितना परिश्रम करते हैं। और एक लापरवाह ड्राइवर की टक्कर से वह अनमोल जीवन चंद सेकंडों में सड़क पर समाप्त हो जाता था। जब भी किसी संत के कालधर्म की खबर आती, पूरे देश के जैन समाज में मातम पसर जाता। हफ्तों तक साधु-साध्वियां विहार करने से डरते थे।

उस समय यह दृश्य देखकर प्रवचन शिखर पूज्य आचार्य भगवंत श्री महाबोधि सूरीश्वर जी महाराज साहेब का हृदय भीतर से छलनी हो उठता था। जब वे स्वयं विहार करते, तो देखते कि बड़े-बड़े संघ गाजे-बाजे के साथ उन्हें लेने तो आते थे, लेकिन दो दिन बाद जब आगे का विहार होता, तो हाईवे पर छोड़ने एक भी श्रावक नहीं आता था।

पूज्यश्री के मन में यह दर्द अंगारे की तरह सुलग रहा था: “क्या हमारे संतों का अंत इसी तरह हाईवे के लावारिस हादसों में होगा? क्या हम सिर्फ शोक सभाएं करने के लिए रह गए हैं?”

3. 15 नवंबर 2009: जब शोक सभा क्रांति में बदल गई

तारीख थी नवंबर 2009। राजस्थान के नाकोड़ा तीर्थ से जैसलमेर की ओर विहार कर रहे थे 80 वर्षीय श्रुतस्थविर, महान आगम उद्धारक पूज्य जंबूविजय जी महाराज साहेब। पचपदरा हाईवे पर एक तेज रफ्तार बोलेरो ने पीछे से भीषण टक्कर मारी। पूज्य जंबू विजय जी महाराज अपने शिष्य सहित उसी पल सड़क पर देवलोक हो गए।

एक 80 साल के महापुरुष के जाने का अर्थ था—जैन शासन की एक पूरी ज्ञान-लाइब्रेरी सड़क के किनारे समाप्त हो गई थी!

इस घटना ने पूरे देश को हिला दिया। कुछ दिन बाद, 15 नवंबर 2009 को महाराष्ट्र के भिवंडी स्थित ओसवाल पार्क में पूज्य जंबूविजय जी महाराज की विशाल गुणानुवाद सभा रखी गई।

पाट पर विराजमान पूज्य आचार्य श्री महाबोधि सूरीश्वर जी महाराज साहेब ने जब मुखारविंद से फरमाया, तो उनकी आंखों में नमी थी, लेकिन वाणी में शासन-रक्षा की प्रखर पुकार थी:

“आज तक हमने केवल निष्क्रिय गुणानुवाद किए हैं—गुरुओं के गुण गाए, अनुमोदना की, प्रभावना ली और अपने-अपने घर चले गए! लेकिन आज जंबू विजय जी महाराज को सच्ची श्रद्धांजलि तब होगी, जब हम ‘सक्रिय गुणानुवाद’ करेंगे। यदि हम खुद संयम का मार्ग नहीं ले सकते, तो क्या हम अपने गुरु भगवंतों के रास्ते का कांटा भी नहीं हटा सकते? क्या हम उनके रक्षक बनकर उनके साथ नहीं चल सकते?”

व्याख्यान संपन्न हुआ। पूज्यश्री अपने पाट पर विराजे ही थे कि भिवंडी का एक होनहार युवक सामने आया। उसकी आंखें नम थीं। उसने हाथ जोड़कर वंदना करते हुए कहा, “महाराज साहेब, आपकी पीड़ा ने दिल को छू लिया है। हम तैयार हैं। बताइए क्या सेवा करनी है?”

पूज्यश्री ने पूछा, “कितने लोग हो?”

युवक ने कहा, “महाराज साहेब, हम 9 दोस्त हैं।”

पूज्यश्री ने फरमाया, “जाओ, अभी बैठ जाओ। यह 9 लोगों से होने वाला काम नहीं है। पहले 90 जवान तैयार करो, फिर हम यह सुरक्षा की दीवार खड़ी करेंगे।”

युवक ने कहा, “गुरुदेव, इसके लिए तो आपको ही पधारना पड़ेगा।”

अगले ही दिन पूज्यश्री भिवंडी के गोकुल नगर पधारे, जहां सुबह की पाठशाला चल रही थी। 200 से अधिक युवा सामने बैठे थे। पूज्यश्री ने फरमाया, “यदि हमें साधु-साध्वियों की रक्षा करनी है, तो समाज के युवाओं को पहरेदार बनना पड़ेगा। मुझे 90 समर्पित युवक चाहिए जो भिवंडी की सीमा में किसी भी संत को अकेला न चलने दें!”

उसी क्षण, एक साथ 90 हाथ हवा में उठ गए।

15 नवंबर 2009 का वह दिन था, जब भिवंडी में पूज्य आचार्य श्री महाबोधि सूरी जी ने सेवा की जो धूप जलाई थी, उसकी सुगंध आज पूरे हिंदुस्तान में फैल चुकी है।

4. कारवां बढ़ता गया: 90 से 35,000 जांबाज

एक महीने के भीतर भिवंडी के उन 90 युवाओं ने ऐसा अनुशासन दिखाया कि भिवंडी से गुजरने वाले हर संत निश्चिंत हो गए। फिर यह सेवा-सुगंध पूरे देश में फैलती चली गई:

• मुंबई का अभेद्य किला: बात मुंबई पहुंची तो ठाणे, मुलुंड, घाटकोपर, दादर से लेकर बोरीवली, कांदिवली, विरार और भाईंदर तक 60 से अधिक जैन संघों के 2,000 से अधिक युवा सड़कों पर उतर आए।

• गुजरात में विस्तार (2012): जब पूज्यश्री का चातुर्मास 2012 में सूरत हुआ, तो उन्होंने वापी में युवाओं को प्रेरित किया। देखते ही देखते वापी, वलसाड, नवसारी, सूरत, भरूच, वडोदरा और अहमदाबाद तक सेवा का जाल बिछ गया। आज केवल गुजरात में 80 से 90 केंद्रों पर सेवा सक्रिय है। अहमदाबाद के वीर कलिकुंड तक 36 किलोमीटर पैदल चलकर संतों को सुरक्षित ले जाते हैं।

• मध्य प्रदेश का विस्तार: एमपी के युवाओं ने पूज्यश्री से मार्गदर्शन मांगा। पूज्यश्री की प्रेरणा से प्रशिक्षित सेवक वहां पहुंचे। पहले ही दिन 45 गांवों में ग्रुप बना, दूसरे चरण में 75 गांव जुड़े और आज मध्य प्रदेश के 400 से ज्यादा गांवों में विहार सेवा कार्यरत है।

• राजस्थान व मेवाड़: राजस्थान के शिवगंज में निशीथजी ने मोर्चा संभाला। आज पूरे राजस्थान में और पं. श्री निरागरत्न वि.म. की प्रेरणासे मेवाड़ के 400 से अधिक केंद्रों पर विहार सेवा की शाखाएं स्थापित हैं।

• शेष भारत की राहें: कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में जहां दो संघों के बीच 100 से 125 किलोमीटर का फासला होता है, वहां के सेवक संतों के साथ दिन-रात चलते हैं, उनकी उपधि (सामान) संभालते हैं, गोचरी और ठहरने की उत्तम व्यवस्था करते हैं।

• इसके अलावा दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, केरला, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, एवं गोवा में विहार सेवकों द्वारा अनुकूलतानुसार विहार सेवा दी जाती है।

5. त्याग और समर्पण की प्रेरक घटनाएं

मां का दिल और बेटे का फर्ज

एक दिन सुबह-सुबह एक विहार सेवक हाईवे पर गुरु भगवंतों के आगे सुरक्षार्थ चल रहा था। सुबह करीब 6:30 बजे उसकी मां का फोन आया: “बेटा, कहां है तू?”

बेटे ने कहा, “मां, विहार में हूं। कोई खास बात?”

मां ने बात संभालते हुए कहा, “नहीं-नहीं, कुछ नहीं। जब घर आए तो रास्ते से थोड़े मुरमुरे लेता आना।”

विहार पूरा कराकर बेटा जब मुरमुरे लेकर घर पहुंचा, तो पता चला पिताजी का शंखेश्वरतीर्थ में अवसान हो गया था ।

बेटा रोते हुए मां से लिपट गया, “मां, तूने फोन पर क्यों नहीं बताया?”

उस श्राविका मां ने आंसुओं को पोंछते हुए कहा: “बेटा, तेरे पिता सुबह 4 बजे शंखेश्वर जी में शांत हो गए थे। खबर मुझे 6 बजे मिली। मैंने तुझे फोन लगाया, लेकिन फिर सोचा कि अगर मैंने कह दिया कि तेरे पिता नहीं रहे, तो तू गुरु महाराज को उस वीरान हाईवे पर अकेला छोड़कर भागा चला आएगा। तेरे पिता तो अब वापस नहीं आ सकते थे, लेकिन गुरु भगवंतों की सुरक्षा बीच रास्ते में छूट जाती, यह मुझे मंजूर नहीं था!”

दूल्हा बना विहार सेवक

एक अन्य युवा की दोपहर 3 बजे शादी का मुहूर्त था। घर में मांगलिक प्रसंग चल रहा था। शाम को ग्रुप कैप्टन की ओर से सूचना आई कि कल सुबह 5 बजे संतों का विहार है। वह युवक बिना किसी को बताए चुपचाप सुबह 3:30 बजे पीली टी-शर्ट पहनकर हाईवे पर पहुंच गया!

रास्ते में किसी साथी ने कैप्टन से कहा, “अरे, आपको पता है? आज दोपहर में इसकी शादी है!”

कैप्टन ने क्षमा मांगते हुए कहा, “भाई, मुझे मालूम नहीं था, तू तुरंत घर जा।”

उस युवक ने सहज भाव से कहा: “कैप्टन साहब, सॉरी क्यों बोल रहे हैं? मैं तो आपका धन्यवाद कर रहा हूं। मेरी नई जिंदगी का पहला दिन गुरु भगवंतों के चरणों की सेवा और मंगल आशीर्वाद से शुरू हो रहा है, इससे बड़ा शगुन मेरी शादी के लिए और क्या हो सकता है!”

6. वैज्ञानिक सुरक्षा, 'रिजर्व फंड' और कल्पवृक्ष जैसी सेवाएं

1. रेडियम पीली टी-शर्ट: सुबह के गाढ अंधेरे में दूर से आ रहे वाहन चालक को स्पष्ट दिख सके, इसके लिए विशेष नियॉन यलो टी-शर्ट और रेडियम रिफ्लेक्टर स्ट्रिप्स को अनिवार्य यूनिफॉर्म बनाया गया।

2. रिजर्व फंड (सेवकों का सुरक्षा कवच): सेवा करते हुए जब भिवंडी के लकीश जी, खोपोली के मीत जैन, कर्जत की श्राविकाएं और दावणगेरे के श्रावक जैसे समर्पित साथी सड़क हादसों में स्वर्गस्थ हुए या गंभीर रूप से घायल हुए, तो पूज्यश्री ने ऐतिहासिक निर्णय लिया। उन्होंने समाज के श्रेष्ठियों के सहयोग से एक ‘रिजर्व फंड’ स्थापित किया, ताकि किसी भी अनहोनी पर पीड़ित सेवक के परिवार का संबल और संपूर्ण इलाज संस्था की ओर से सुनिश्चित किया जा सके।

3. कल्पवृक्ष की भूमिका: विहार सेवा केवल आगे-पीछे चलना नहीं है। यह संतों के लिए ‘कल्पवृक्ष’ बन चुका है—उपधि (सामान) का सुरक्षित वहन, व्हीलचेयर चलाना, संतों का अस्वस्थ होने पर डॉक्टर और सर्जरी का त्वरित प्रबंध, और व्हीलचेयर चलाने वाले सेवादारों की सुविधा का ध्यान रखना भी इनकी सेवा का अंग है।

4. साध्वी जी भगवंतों का अभय: अलसुबह जब साध्वी जी भगवंत विहार करती थीं, तो असामाजिक तत्वों की चिंता रहती थी। आज चारों तरफ पीली टी-शर्ट का पहरा होने से साध्वी जी भगवंत फरमाती हैं: “जब विहार सेवक साथ होते हैं, तो हाईवे भी हमें हमारे पिताजी के गार्डन जैसा सुरक्षित लगता है!”

7. आध्यात्मिक रूपांतरण: जब रक्षक ही संयमी बन गए
सड़क पर उतरते ही श्वेतांबर, दिगंबर, स्थानकवासी और तेरापंथी के सारे मतभेद समाप्त हो जाते हैं। पूज्यश्री की एक ही प्रेरणा रही है: “अपनी-अपनी क्रियाएं अपने-अपने उपाश्रय, भवन या स्थानक में करो, लेकिन सड़क पर केवल एक ही पहचान है—हम सब जैन हैं और ये हमारे पूज्य गुरु हैं!”
 
इस सेवा ने युवाओं के जीवन को गहराई से बदला:
• जो युवक कभी मंदिर नहीं जाते थे, वे नियमित सामायिक और पूजा करने लगे।
• जिन्होंने कभी धर्म की क्रियाएं नहीं की थीं, वे रात्रिभोजन त्याग कर वर्षी तप और उपवास करने लगे।
• सर्वोच्च उपलब्धि: संतों के साए में चलते-चलते 50 से अधिक विहार सेवकों ने संसार का त्याग कर स्वयं जैन भगवती दीक्षा अंगीकार कर ली!
8. आज का विशाल स्वरूप (आंकड़ों के आईने में)
पैमाना / आयाम वर्तमान स्थिति (VSG)
भौगोलिक विस्तार भारत के 14 राज्य (महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, म.प्र., दिल्ली, पंजाब, केरल, प. बंगाल, छत्तीसगढ़ आदि)
सक्रिय केंद्र (Centers) 1,500 से 2,000 सक्रिय शाखाएं व केंद्र
विहार सेवकों की संख्या 35,000+ समर्पित और अनुशासित युवा
हादसों में कमी प्रति वर्ष 20 से घटकर मात्र 2-3 या नगण्य
सालाना राष्ट्रीय सम्मेलन हर साल पर्युषण के बाद चातुर्मास के तीसरे रविवार को महासम्मेलन
9. उपसंहार: Z+ सुरक्षा और 18,500 वर्षों का संकल्प

पूज्य आचार्य श्री महाबोधि सूरीश्वर जी महाराज साहेब सदैव फरमाते हैं:

“लोग मुझसे पूछते हैं कि आपने इतना बड़ा संगठन कैसे खड़ा कर दिया? मैं कहता हूं—मैं तो केवल एक निमित्त मात्र हूं। यह सब जैन शासन के 18,000 साधु-साध्वियों के पुण्योदय का चमत्कार है! जिस तरह देश के मंत्रियों को ‘Z+ सिक्योरिटी’ मिलती है, हमारे नंगे पांव चलने वाले वीतरागी संत तो जगत् के आध्यात्मिक राजा हैं, उन्हें सड़क पर पूर्ण अभयदान मिलना ही चाहिए!

जब तक नसों में खून दौड़ता है, शरीर जीवित रहता है; जब तक संत सड़कों पर विहार करते रहेंगे, जैन धर्म जीवित रहेगा। यह विहार सेवा आज की नहीं, अगले साढ़े अठारह हजार वर्षों तक जैन शासन का सुरक्षा कवच बनकर अनवरत चलती रहेगी!”

विक्रम संवत २०६५ का हमारा चातुर्मास भिवंडी में हुआ था। चातुर्मास पूर्ण होने के पश्चात हम भिवंडी के ओसवाल पार्क में आए, जहाँ उपधान तप का प्रारंभ हुआ। कार्तिक वद नवमी का दिन था। शीत ऋतु का समय था और सुबह की ठंड के कारण उपाश्रय के सभी द्वार बंद करके हम बैठे थे। किंतु प्रातः लगभग ८ बजे एक अत्यंत दुःखद समाचार ने उन बंद दरवाजों को मानो भेद दिया। वह समाचार था—महेसाणा के निकट चार साध्वीजी भगवंतों के भीषण एवं प्राणघातक दुर्घटना का। एक ही परिवार की उन चार साध्वीजी भगवंतों के दुर्घटनाग्रस्त होने की घटना ने दो दिनों तक दिन का चैन और रात की नींद छीन ली। मन बार-बार उसी घटना की ओर चला जाता था और हृदय शोक से भर उठता था।

तीसरे दिन मन कुछ संभलने लगा ही था कि एक बार फिर सुबह के समय ऐसे समाचार प्राप्त हुए, जिन्होंने पत्थर जैसे कठोर हृदय को भी कंपा दिया। यह समाचार था—विश्वप्रसिद्ध विद्वान पूज्य मुनिराज श्री जंबूविजयजी महाराज के दुर्घटनाग्रस्त होने का। यह सुनकर हृदय व्याकुल हो उठा। आँखों में आँसू थे, किंतु अंतरात्मा में एक प्रचंड अग्नि प्रज्ज्वलित हो चुकी थी। मन में बार-बार यही विचार उठ रहा था कि यदि दुर्घटनाओं का यह सिलसिला इसी प्रकार चलता रहा, तो भगवान महावीर के शासन की सुरक्षा और संतों का विहार कैसे सुरक्षित रहेगा? ऐसा प्रतीत हुआ कि अब केवल दुःख व्यक्त करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि कुछ ठोस प्रयास करना आवश्यक है।

इन्हीं भावनाओं के साथ गुणानुवाद की एक सभा आयोजित की गई। एक ओर जिनशासन के प्रति गहरा अनुराग था, तो दूसरी ओर संतों की सुरक्षा को लेकर मन में तीव्र चिंता और वेदना थी। इस भावपूर्ण वातावरण में संघ के समक्ष कुछ आत्ममंथन कराने वाले प्रश्न रखे गए। हम अपने पुत्र या पुत्री के कॉलेज जाने पर, पति के कार्यालय जाने पर अथवा पत्नी के मायके जाने पर बार-बार मोबाइल के माध्यम से उनका हालचाल पूछते हैं। हम यह जानकर संतोष प्राप्त करते हैं कि वे सुरक्षित हैं और समय पर अपने गंतव्य तक पहुँच गए हैं।

किन्तु क्या हम अपने गुरु भगवंतों के प्रति भी उतनी ही चिंता और जिम्मेदारी का भाव रखते हैं? क्या हम यह जानने का प्रयास करते हैं कि वे अपने अगले पड़ाव तक सकुशल पहुँच गए हैं या नहीं? जब प्रभावक आचार्य भगवंत हमारे नगर में पधारते हैं, तब हम बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ उनका स्वागत करते हैं, वाद्ययंत्रों और मंगल ध्वनियों के साथ उन्हें अपने संघ में पधराते हैं। परंतु जब वही गुरु भगवंत हमारे संघ से विहार करते हैं, तब उन्हें अगले गाँव, अगले पड़ाव या स्टेशन तक सुरक्षित पहुँचाने के लिए कितने लोग साथ जाते हैं? यह प्रश्न केवल व्यवस्था का नहीं, बल्कि गुरु भक्ति, उत्तरदायित्व और जिनशासन के प्रति हमारी सच्ची संवेदनशीलता का है। गुरु भगवंतों के आगमन पर सम्मान करना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक उनके विहार के समय उनकी सुरक्षा और सुविधा का ध्यान रखना भी है। यही सच्ची गुरु-भक्ति और जिनशासन के प्रति हमारी जागरूकता का परिचायक है।

याद रखिए...

भगवान महावीर को तीर्थंकर बनाने वाली साधना नंदन ऋषि के भव में की गई बीस स्थानक तप की आराधना थी, किन्तु उन्हें सम्यग्दर्शन प्राप्त कराने का कारण नयसार के भव में की गई साधु भगवंतों की विहार-सेवा थी। नयसार ने साधु भगवंतों को द्रव्य मार्ग पर आगे बढ़ाने में सहायता की थी, और बदले में साधु भगवंतों ने उन्हें भावमार्ग पर अग्रसर किया। यह घटना दर्शाती है कि साधु-संतों की सेवा केवल पुण्य का कारण ही नहीं, बल्कि आत्मकल्याण और सम्यक्त्व की प्राप्ति का भी महान साधन है।

आवश्यक निर्युक्ति आदि आगम ग्रंथों में तीर्थंकर नामकर्म के बंध के लिए बीस स्थानकों का वर्णन किया गया है। इनमें सत्रहवाँ स्थानक है—वैयावृत्य समाधि। इस स्थानक में आचार्य आदि दस प्रकार के साधु भगवंतों की तेरह प्रकार से वैयावृत्य (सेवा) करने का विधान बताया गया है। इनमें दो प्रमुख प्रकार विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं—पहला, विहार कर रहे साधु भगवंतों की उनके साथ जाकर सहायता करना; और दूसरा, विहार के दौरान दुष्ट व्यक्तियों, चोरों अथवा अन्य बाधाओं से उनकी रक्षा करना। इस प्रकार की सेवा से साधु भगवंतों को समाधि प्राप्त होती है और ऐसी सेवा करने वाले जीव तीर्थंकर नामकर्म के बंध का महान पुण्य अर्जित करते हैं।

वर्तमान समय में इस सेवा की आवश्यकता और भी अधिक बढ़ गई है। जिस प्रकार रोगग्रस्त साधु की सेवा करने का विशेष लाभ बताया गया है, उसी प्रकार विहार कर रहे साधु भगवंतों की सहायता और सुरक्षा का भी अत्यंत विशिष्ट महत्त्व है। यह केवल एक सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि जिनशासन की प्रभावना और आत्मकल्याण का श्रेष्ठ साधन है। साधु भगवंतों के विहार को सुरक्षित और निर्विघ्न बनाना वास्तव में धर्म की सेवा करना है।

इतना कहकर मैंने अपना प्रवचन समाप्त किया। प्रवचन के परिणाम की कोई अपेक्षा किए बिना मैं अपने आसन पर बैठ गया। कुछ समय बाद एक युवा मेरे पास आया। उसने कहा, “आज का प्रवचन सुनने के बाद हमने निश्चय किया है कि भिवंडी से जो भी गुरु भगवंत विहार करेंगे, हम उन्हें कम से कम एक स्टेशन तक पहुँचाने अवश्य जाएँगे।” मैं उसके उत्साह और श्रद्धा को देख रहा था। मैंने उससे कहा, “कोई भी संकल्प लेने से पहले अच्छी तरह विचार कर लेना, ताकि भविष्य में पीछे हटने की नौबत न आए।” किंतु वह युवक अपने संकल्प में दृढ़ था और उसकी वाणी में गुरु-भक्ति तथा जिनशासन के प्रति समर्पण स्पष्ट दिखाई दे रहा था।